विरासत से वर्चुअल तक : हिंदी की अकथ कहानी

आईआईटी, पटना में मुझ द्वारा दिए गए व्याख्यान के कुछ अंश

Prof. Niranjan Sahay

9/15/2025

भारत में भाषाओं का संदर्भ अत्यंत दिलचस्प और स्फूर्तिदायक है, क्योंकि यहाँ भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं रही हैं बल्कि सांस्कृतिक विकास, सामूहिक चेतना और सामाजिक समरसता की आधारशिला बनी हैं। भारतीय समाज में सम्वाद या आपसी संपर्क की भाषा पर कभी वैसा विवाद नहीं हुआ जैसा अन्य राष्ट्रों में देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ की परंपरा में बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता को सम्मान दिया गया। यदि हम इसकी ऐतिहासिक यात्रा पर दृष्टि डालें तो संस्कृत से लेकर लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, पुरानी हिन्दी, अवधी, ब्रजभाषा और खड़ी बोली हिन्दी तक का विकास केवल भाषिक संक्रमण नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा का निर्माण है, जिसने भारतीय समाज को जोड़ने का कार्य किया।

द्रविण भाषाओं ने भी इसी परंपरा में हाथ मिलाया और सभी ने मिलकर आगे बढ़ना, सपने देखना और संघर्ष करना सीखा। भारतीय भाषाओं के विकासक्रम पर विचार करते हुए राहुल सांकृत्यायन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने पुरानी हिन्दी की पहचान के लिए तीन प्रमुख भाषिक आधार बताए—पहला क्षतिपूरक दीर्घीकरण जैसे ‘कज्ज’ से ‘काज’ और ‘कम्म’ से ‘काम’, दूसरा परसर्गों के प्रयोग की अधिकता जैसे ‘ससि के मुख से अहि से निकसे’ जिसका अर्थ है मानो चंद्रमा के मुख से सर्प निकल रहे हों, और तीसरा भाषिक संरचना की विशिष्टताएँ, जिनसे पुरानी हिन्दी की पहचान संभव होती है।

प्राकृत/ अपभ्रंश साहित्य का प्रसार इस परंपरा में विशेष महत्त्व रखता है। सरहपा (749ई,मगध),कण्हपा (820, कर्नाटक), स्वयंभू (873, पउमचरिउ), कम्बलपाद (उड़ीसा), जालंधरपाद (नागरकोट, कांगड़ा), मीनपा (कामरूप, असम), तन्तिपा (उज्जैन) और नाड या नारोवा (कश्मीर) जैसे कवियों ने अपभ्रंश भाषा में कृतियाँ लिखीं, जिससे यह सिद्ध होता है कि मुल्तान, मान्यखेट, कान्यकुब्ज, नालंदा और दक्षिण भारत तक अपभ्रंश व्यापक रूप से प्रचलित थी। संस्कृत रचनाओं में पालि और प्राकृत बोलने वाले पात्रों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि उच्च भाषा और जनभाषा के बीच संवाद की परंपरा सतत बनी रही। ब्रजभाषा और संत कवियों के संतो-पदों के गायन ने भारतीय भाषाओं के भीतर संवाद, भक्ति और लोक-संस्कृति की एक नई चेतना का निर्माण किया।

मलयालम में भी लगभग तीन सौ वर्षों से संतो-पदों के गायन की परंपरा `कालक्षेपम’ रही, जो इस समन्वय की स्थायी मिसाल है। 14वीं सदी में दक्षिण भारत के बहमनी राज्य में हिन्दी या हिन्दवी को प्रशासनिक और साहित्यिक भाषा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा, जिसे कभी-कभी ‘दक्खिनो हिन्दी’ भी कहा जाता था। संस्कृत, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, अवधी, अरबी और फारसी भाषाओं का मिलाजुला प्रयोग इस क्षेत्र में देखने को मिलता है। ख्वाजा बदानवराज गेसूदराज जैसे संत-विद्वानों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। मध्यकालीन दौर में विद्यापति, कबीर, मीरा जैसे कवि सामने आए, जो बहुभाषी थे और अपनी-अपनी भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य रचते हुए हिन्दी को भी समृद्ध करते रहे। नरसिंह मेहता ने गुजराती और हिन्दी दोनों में रचनाएँ कीं, जिनमें कलस गुजराती और कलस हिन्दुस्तानी जैसे रूप मिलते हैं। नामदेव और तुकाराम जैसे संत कवियों ने हिन्दी और मराठी दोनों भाषाओं में कृतियाँ रचकर भाषाई समन्वय को मजबूत किया।

भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंधों को और गहरा किया। तमिल की संत कवयित्री अंदाल, कन्नड़ की अक्क महादेवी, मराठी की मुक्ताबाई, जनाबाई और बहिना बाई, कश्मीरी की ललघद और हिन्दी के कबीर, मीरा तथा तुलसीदास जैसे कवियों ने क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया। इन संत कवियों की विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा तक सीमित न रहकर अन्य भाषाओं में भी रचनाएँ करते थे, जिससे उनकी वाणी व्यापक जनमानस तक पहुँचती थी। बंगाल के बाउल गायक भी इसी बहुभाषी परंपरा के अंग थे, जो अपनी साधना और गीतों से पूरे देश को जोड़ते रहे।

आधुनिक युग में एनी बेसेंट ने हिन्दी प्रचार के समर्थन में न्यू इंडिया पत्रिका) तथा आनंद विकटन और द हिन्दू जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से आन्दोलन खड़ा किया।1922में मोतीलाल नेहरू ने पहले हिन्दी विद्यालय का उद्घाटन किया, जिसे द्रविण नेता श्री राम स्वामी नामकर ने अपने क्षेत्र में स्थापित किया। दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार की इस परंपरा को महात्मा गांधी ने भी समर्थन दिया और अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी प्रचार सभा के कार्यों में सक्रिय रूप से लगाया। मदुरै में ठाकुर खाँ चंद्रवर्मन द्वारा 1915-1916 में किए गए प्रयासों ने हिन्दी को दक्षिण भारत में मजबूत आधार दिया। भाषाई समन्वय का एक और प्रेरक उदाहरण त्रावणकोर के महाराज स्वाति तिरुनाल राजवर्मा (1813) हैं, जिन्होंने संस्कृत, तमिल, मलयालम और हिन्दी में लेखन किया। उनकी हिन्दी रचना ‘‘रामचंद्र प्रभु तुम बिन प्यारे कौन खबर ले मेरी, बाज रही जिनकी नगरी में सदा धर्म की भेरी’’ इस बात का प्रमाण है कि दक्षिण भारत में भी हिन्दी की स्वीकृति थी।

इस प्रकार भारत की भाषाई यात्रा हमें यह सिखाती है कि यहाँ भाषा कभी संघर्ष का कारण नहीं बनी बल्कि सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक एकता का माध्यम बनी। बहुभाषिक संत कवियों, विद्वानों और नेताओं ने न केवल अपनी भाषाओं को जीवंत बनाए रखा बल्कि अन्य भाषाओं के साथ सह-अस्तित्व का भाव भी विकसित किया। यही कारण है कि भारत की भाषाई परंपरा लोकतांत्रिक चेतना और अखंड राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गई है। यह परंपरा आज भी हमें यह सिखाती है कि विभिन्न भाषाओं का सम्मान और परस्पर संवाद ही भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति है।

भारत की आज़ादी की संपर्क भाषा हिन्दी होने के कारण स्वाधीन भारत की संसद ने राजभाषा के मुद्दे पर विचार किया। 12 सितम्बर को सम्विधान सभा की भाषा सम्बन्धी बहस शुरू हुई। 14 सितम्बर 1949 को शाम छह बजे हिन्दी को ध्वनिमत से राजभाषा घोषित किया गया। सम्विधान सभा की बहसों का प्रकाशन हुआ है। इसके नौवें खंड में भाषा पर बात है, 180 पृष्ठ की बहस है। यह तय किया गया कि अंतिम वोटिंग नहीं करेंगे, अलबत्ता उसके पहले छोटी-छोटी असहमतियों पर वोटिंग कर लेंगे। अंत में तय हुआ हिन्दी राजभाषा होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी। इसपर ज़ोरदार बहस हुयी कि गिनती के अंक क्या होंगे? पर वोटिंग इसपर भी नहीं हुई, के.एम.मुंशी (भरूच, मुंबई) और एन.गोपाल स्वामी आयंगर (चेन्नई) की सहमति के बाद अंतरराष्ट्रीय अंक यानी रोमन लिपि के 1,2,3...आदि स्वीकार हुआ।

स्वाधीन भारत में हिंदी भाषा के अभूतपूर्व विस्तार की बानगी बेहद प्रभावी और उल्लेखनीय है।1991 में प्रथम भाषा के रूप में हिन्दी बोलने-बरतने वालों कि संख्या 39 प्रतिशत थी, 83 करोड़ में 32 करोड़, 2001 की जनगणना में यह प्रतिशत बढ़कर 41 प्रतिशत हो गयी, 2011 में यह संख्या 121 करोड़ से 53 करोड़ 43.06 प्रतिशत हो गयी, वहीँ जिससे दो लाख सत्तर हज़ार यानी 0.02 प्रतिशत। 2021 की जनगणना रिपोर्ट आई नहीं है, अभी काम हो रहा है। 145 करोड़ हमारी अनुमानित आबादी है, ट्रेंड के मुताबिक़ हिन्दी बोलने वालों का प्रतिशत 45 से 46 प्रतिशत होने की सम्भावना है। 64 से 66 करोड़ लोग प्रथम भाषी हिन्दी हो जाएंगे। भारत में 31 भाषाओं का जनगणना सर्वेक्षण होता है जबकि दुनिया में 7115 भाषाओं का। 7115 भाषाओं में 150 भाषाएँ ऐसी हैं जिनके बोलने वालों कि संख्या दस से कम है। लगभग छः हज़ार भाषाएँ ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक लाख से कम है। पूरी दुनिया की आठ सौ करोड़ की आबादी में हिन्दी का स्थान तीसरा है। हिन्दी तीसरे स्थान पर है, हमारा प्रतिशत 08प्रतिशत से ज़्यादा है, अंग्रेजी का 16 और मंदारिन का 14 प्रतिशत। फेंच, जर्मन सब हमसे पीछे हैं।

हिंदी भाषा की वर्चुअल दुनिया में स्थिति पर विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि डिजिटल युग में हिन्दी एक ओर अभूतपूर्व विस्तार पा रही है तो दूसरी ओर अनेक चुनौतियों से भी जूझ रही है। सन् 2000 में जब हिन्दी का पहला वेबपोर्टल अस्तित्व में आया तभी से इंटरनेट पर हिन्दी ने अपनी छाप छोड़नी प्रारम्भ कर दी जो अब रफ्तार पकड़ चुकी है। नई पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी ने भी इसकी उपयोगिता समझ ली है। मुक्तिबोध, त्रिलोचन जैसे हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि प्रकाशकों द्वारा उपेक्षित रहे। इंटरनेट ने हिन्दी को प्रकाशकों के चंगुल से मुक्त कराने का भी भरसक प्रयास किया है। इंटरनेट पर हिन्दी का सफर रोमन लिपि से प्रारम्भ होता है और फॉण्ट जैसी समस्याओं से जूझते हुए धीरे-धीरे यह देवनागरी लिपि तक पहुँच जाता है। यूनिकोड, मंगल जैसे यूनिवर्सल फॉण्टों ने देवनागरी लिपि को कम्प्यूटर पर नया जीवन प्रदान किया है। आज इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित लगभग सत्तर ई-पत्रिकाएँ देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रहनेवाली प्रवासी भारतीय साहित्य प्रेमी पूर्णिमा बर्मन 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' नामक ई-पत्रिका की सम्पादक हैं और 1996 से 'प्रतिबिम्ब' नामक नाट्य संस्था चला रही हैं। 'अभिव्यक्ति' हिन्दी की पहली ई-पत्रिका है जिसके आज तीस हजार से भी अधिक पाठक हैं। 'अभिव्यक्ति' के बाद 'अनुभूति', 'रचनाकार', 'हिन्दी नेस्ट', 'कविताकोश', 'संवाद' आदि ई-पत्रिकाएँ इंटरनेट पर अपनी छटा बिखेर रही हैं। इनकी बढ़ती पैठ से घबराकर हिन्दी के अनेक प्रकाशकों-सम्पादकों ने अपनी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के ई-संस्करण जारी किए। फलस्वरूप आज 'हंस', 'कथादेश', 'नया ज्ञानोदय' जैसी न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। यही नहीं, आज जितने भी प्रतिष्ठितडिजिटल पत्रकारिता, ब्लॉग लेखन, ई-पत्रिकाएँ और वेब पोर्टल हिन्दी को वर्चुअल दुनिया में नया स्वरूप दे रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा मंचों पर भी हिन्दी की उपस्थिति बढ़ रही है, जिससे यह ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा और प्रबंधन जैसे विषयों में अभिव्यक्ति का माध्यम बनने लगी है। यूट्यूब पर हिन्दी कंटेंट क्रिएटर्स ने लाखों-करोड़ों दर्शकों तक पहुँच बनाकर यह प्रमाणित कर दिया है कि हिन्दी में अपार संभावनाएँ हैं। ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग ने भी हिन्दी को अपनाया है, क्योंकि भारत के उपभोक्ताओं का बड़ा तबका मातृभाषा में संवाद को प्राथमिकता देता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के युग में हिन्दी भाषा संसाधनों की कमी, मानकीकरण का अभाव और यूनिकोड की सीमाएँ भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इसके अतिरिक्त डिजिटल माध्यमों पर हिन्दी में गंभीर शोधपरक सामग्री अपेक्षाकृत कम उपलब्ध है, जिससे उच्च शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से इसका उपयोग सीमित दिखाई देता है। बावजूद इसके, सरकारी और निजी प्रयासों के साथ-साथ साहित्यकारों, पत्रकारों और आम उपयोगकर्ताओं की सक्रियता से हिन्दी का डिजिटल परिदृश्य लगातार मजबूत हो रहा है। हिन्दी विकिपीडिया, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन शब्दकोश और अनुवाद सेवाएँ हिन्दी के विस्तार में सहायक हो रही हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि वर्चुअल दुनिया में हिन्दी भाषा की स्थिति संक्रमणकालीन है—एक ओर इसमें असीम संभावनाएँ हैं जो इसे वैश्विक भाषा बना सकती हैं, वहीं दूसरी ओर इसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सतत प्रयासों की आवश्यकता है ताकि यह मात्र बोलचाल की नहीं बल्कि ज्ञान और नवाचार की भी प्रमुख भाषा बन सके।

सारांशत:हम कह सकते हैं कि हिन्दी का जनतंत्र विकसित हुआ है।मौजूदा दौर की हिन्दी आत्मविश्वास से लबरेज है। हिन्दी का यह जनतंत्र अंग्रेजी के आभिजात्य से डरा और घबराया हुआ नहीं है। हिन्दी संस्कृत की अनुकृति मात्र भी नहीं रही अब। वह संस्कृत, जनपदीय भाषाओं, अंग्रेजी और उर्दू से बतियाती हुई खुद की पहचान बनाने में सफल हुई है। वह धीरे-धीरे एक समर्थ भाषा के रूप स्थापित होकर अपने नए दौर के हौसले और भरोसे में बढ़ोत्तरी कर रही है। नयी शिक्षा नीति2020 ने भाषा के सिलसिले में दो बातों पर बल दिया है – पहली बात मतृभाषा में शिक्षा की वकालत और दूसरी बात बहुभाषिकता की व्याप्ति और ताकत को शिक्षायी नीति निर्धारण में में स्वीकार। सवाल यह है कि इससे हिन्दी पर क्या असर होगा। शिक्षा की दुनिया में भाषा का ज़िक्र दो सन्दर्भों में होता है – विषय के रूप में और माध्यम भाषा के रूप में। हिन्दी की दुनिया विषय के रूप में अपने विस्तार को बदलते दौर में बनाए रखे इसके लिए ज़रूरी है कि उसमें रोज़गार की सम्भावनाएं बरकरार रहे। जब मातृभाषा में शिक्षा की बात की जाती है तो एक बड़े भूभाग की मातृभाषा हिन्दी होने के कारण इस भाषा का माध्यम भाषा के रूप में स्वीकार, सरकारी नीतियों में एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ने के संकल्प को जाहिर करता है। यह बात ज़रूर समझ लेना चाहिए कि हिन्दी की ताकत को बढाने में भोजपुरी,मैथली, अंगिका, वज्जिका, अवधी, ब्रजभाषा, बुन्देली आदि जनपदीय भाषाओं की खासी भूमिका रही है। जाहिर बात यह है कि जनपदीय भाषाओं से अपनी जड़ों को मजबूत करने का अभ्यास निरंतर जारी रहे।भारत में भाषाओं का संदर्भ अत्यंत दिलचस्प और स्फूर्तिदायक है, क्योंकि यहाँ भाषाएँ केवल संचार का साधन नहीं रही हैं बल्कि सांस्कृतिक विकास, सामूहिक चेतना और सामाजिक समरसता की आधारशिला बनी हैं। भारतीय समाज में सम्वाद या आपसी संपर्क की भाषा पर कभी वैसा विवाद नहीं हुआ जैसा अन्य राष्ट्रों में देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ की परंपरा में बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता को सम्मान दिया गया। यदि हम इसकी ऐतिहासिक यात्रा पर दृष्टि डालें तो संस्कृत से लेकर लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, पुरानी हिन्दी, अवधी, ब्रजभाषा और खड़ी बोली हिन्दी तक का विकास केवल भाषिक संक्रमण नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा का निर्माण है, जिसने भारतीय समाज को जोड़ने का कार्य किया।

द्रविण भाषाओं ने भी इसी परंपरा में हाथ मिलाया और सभी ने मिलकर आगे बढ़ना, सपने देखना और संघर्ष करना सीखा। भारतीय भाषाओं के विकासक्रम पर विचार करते हुए राहुल सांकृत्यायन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने पुरानी हिन्दी की पहचान के लिए तीन प्रमुख भाषिक आधार बताए—पहला क्षतिपूरक दीर्घीकरण जैसे ‘कज्ज’ से ‘काज’ और ‘कम्म’ से ‘काम’, दूसरा परसर्गों के प्रयोग की अधिकता जैसे ‘ससि के मुख से अहि से निकसे’ जिसका अर्थ है मानो चंद्रमा के मुख से सर्प निकल रहे हों, और तीसरा भाषिक संरचना की विशिष्टताएँ, जिनसे पुरानी हिन्दी की पहचान संभव होती है।

प्राकृत/ अपभ्रंश साहित्य का प्रसार इस परंपरा में विशेष महत्त्व रखता है। सरहपा (749ई,मगध),कण्हपा (820, कर्नाटक), स्वयंभू (873, पउमचरिउ), कम्बलपाद (उड़ीसा), जालंधरपाद (नागरकोट, कांगड़ा), मीनपा (कामरूप, असम), तन्तिपा (उज्जैन) और नाड या नारोवा (कश्मीर) जैसे कवियों ने अपभ्रंश भाषा में कृतियाँ लिखीं, जिससे यह सिद्ध होता है कि मुल्तान, मान्यखेट, कान्यकुब्ज, नालंदा और दक्षिण भारत तक अपभ्रंश व्यापक रूप से प्रचलित थी। संस्कृत रचनाओं में पालि और प्राकृत बोलने वाले पात्रों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि उच्च भाषा और जनभाषा के बीच संवाद की परंपरा सतत बनी रही। ब्रजभाषा और संत कवियों के संतो-पदों के गायन ने भारतीय भाषाओं के भीतर संवाद, भक्ति और लोक-संस्कृति की एक नई चेतना का निर्माण किया।

मलयालम में भी लगभग तीन सौ वर्षों से संतो-पदों के गायन की परंपरा `कालक्षेपम’ रही, जो इस समन्वय की स्थायी मिसाल है। 14वीं सदी में दक्षिण भारत के बहमनी राज्य में हिन्दी या हिन्दवी को प्रशासनिक और साहित्यिक भाषा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा, जिसे कभी-कभी ‘दक्खिनो हिन्दी’ भी कहा जाता था। संस्कृत, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, अवधी, अरबी और फारसी भाषाओं का मिलाजुला प्रयोग इस क्षेत्र में देखने को मिलता है। ख्वाजा बदानवराज गेसूदराज जैसे संत-विद्वानों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। मध्यकालीन दौर में विद्यापति, कबीर, मीरा जैसे कवि सामने आए, जो बहुभाषी थे और अपनी-अपनी भाषाओं में श्रेष्ठ साहित्य रचते हुए हिन्दी को भी समृद्ध करते रहे। नरसिंह मेहता ने गुजराती और हिन्दी दोनों में रचनाएँ कीं, जिनमें कलस गुजराती और कलस हिन्दुस्तानी जैसे रूप मिलते हैं। नामदेव और तुकाराम जैसे संत कवियों ने हिन्दी और मराठी दोनों भाषाओं में कृतियाँ रचकर भाषाई समन्वय को मजबूत किया।

भक्ति आंदोलन ने भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंधों को और गहरा किया। तमिल की संत कवयित्री अंदाल, कन्नड़ की अक्क महादेवी, मराठी की मुक्ताबाई, जनाबाई और बहिना बाई, कश्मीरी की ललघद और हिन्दी के कबीर, मीरा तथा तुलसीदास जैसे कवियों ने क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया। इन संत कवियों की विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा तक सीमित न रहकर अन्य भाषाओं में भी रचनाएँ करते थे, जिससे उनकी वाणी व्यापक जनमानस तक पहुँचती थी। बंगाल के बाउल गायक भी इसी बहुभाषी परंपरा के अंग थे, जो अपनी साधना और गीतों से पूरे देश को जोड़ते रहे।

आधुनिक युग में एनी बेसेंट ने हिन्दी प्रचार के समर्थन में न्यू इंडिया पत्रिका) तथा आनंद विकटन और द हिन्दू जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से आन्दोलन खड़ा किया।1922में मोतीलाल नेहरू ने पहले हिन्दी विद्यालय का उद्घाटन किया, जिसे द्रविण नेता श्री राम स्वामी नामकर ने अपने क्षेत्र में स्थापित किया। दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार की इस परंपरा को महात्मा गांधी ने भी समर्थन दिया और अपने पुत्र देवदास गांधी को हिन्दी प्रचार सभा के कार्यों में सक्रिय रूप से लगाया। मदुरै में ठाकुर खाँ चंद्रवर्मन द्वारा 1915-1916 में किए गए प्रयासों ने हिन्दी को दक्षिण भारत में मजबूत आधार दिया। भाषाई समन्वय का एक और प्रेरक उदाहरण त्रावणकोर के महाराज स्वाति तिरुनाल राजवर्मा (1813) हैं, जिन्होंने संस्कृत, तमिल, मलयालम और हिन्दी में लेखन किया। उनकी हिन्दी रचना ‘‘रामचंद्र प्रभु तुम बिन प्यारे कौन खबर ले मेरी, बाज रही जिनकी नगरी में सदा धर्म की भेरी’’ इस बात का प्रमाण है कि दक्षिण भारत में भी हिन्दी की स्वीकृति थी।

इस प्रकार भारत की भाषाई यात्रा हमें यह सिखाती है कि यहाँ भाषा कभी संघर्ष का कारण नहीं बनी बल्कि सांस्कृतिक संवाद और सामाजिक एकता का माध्यम बनी। बहुभाषिक संत कवियों, विद्वानों और नेताओं ने न केवल अपनी भाषाओं को जीवंत बनाए रखा बल्कि अन्य भाषाओं के साथ सह-अस्तित्व का भाव भी विकसित किया। यही कारण है कि भारत की भाषाई परंपरा लोकतांत्रिक चेतना और अखंड राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बन गई है। यह परंपरा आज भी हमें यह सिखाती है कि विभिन्न भाषाओं का सम्मान और परस्पर संवाद ही भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति है।

भारत की आज़ादी की संपर्क भाषा हिन्दी होने के कारण स्वाधीन भारत की संसद ने राजभाषा के मुद्दे पर विचार किया। 12 सितम्बर को सम्विधान सभा की भाषा सम्बन्धी बहस शुरू हुई। 14 सितम्बर 1949 को शाम छह बजे हिन्दी को ध्वनिमत से राजभाषा घोषित किया गया। सम्विधान सभा की बहसों का प्रकाशन हुआ है। इसके नौवें खंड में भाषा पर बात है, 180 पृष्ठ की बहस है। यह तय किया गया कि अंतिम वोटिंग नहीं करेंगे, अलबत्ता उसके पहले छोटी-छोटी असहमतियों पर वोटिंग कर लेंगे। अंत में तय हुआ हिन्दी राजभाषा होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी। इसपर ज़ोरदार बहस हुयी कि गिनती के अंक क्या होंगे? पर वोटिंग इसपर भी नहीं हुई, के.एम.मुंशी (भरूच, मुंबई) और एन.गोपाल स्वामी आयंगर (चेन्नई) की सहमति के बाद अंतरराष्ट्रीय अंक यानी रोमन लिपि के 1,2,3...आदि स्वीकार हुआ।

स्वाधीन भारत में हिंदी भाषा के अभूतपूर्व विस्तार की बानगी बेहद प्रभावी और उल्लेखनीय है।1991 में प्रथम भाषा के रूप में हिन्दी बोलने-बरतने वालों कि संख्या 39 प्रतिशत थी, 83 करोड़ में 32 करोड़, 2001 की जनगणना में यह प्रतिशत बढ़कर 41 प्रतिशत हो गयी, 2011 में यह संख्या 121 करोड़ से 53 करोड़ 43.06 प्रतिशत हो गयी, वहीँ जिससे दो लाख सत्तर हज़ार यानी 0.02 प्रतिशत। 2021 की जनगणना रिपोर्ट आई नहीं है, अभी काम हो रहा है। 145 करोड़ हमारी अनुमानित आबादी है, ट्रेंड के मुताबिक़ हिन्दी बोलने वालों का प्रतिशत 45 से 46 प्रतिशत होने की सम्भावना है। 64 से 66 करोड़ लोग प्रथम भाषी हिन्दी हो जाएंगे। भारत में 31 भाषाओं का जनगणना सर्वेक्षण होता है जबकि दुनिया में 7115 भाषाओं का। 7115 भाषाओं में 150 भाषाएँ ऐसी हैं जिनके बोलने वालों कि संख्या दस से कम है। लगभग छः हज़ार भाषाएँ ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक लाख से कम है। पूरी दुनिया की आठ सौ करोड़ की आबादी में हिन्दी का स्थान तीसरा है। हिन्दी तीसरे स्थान पर है, हमारा प्रतिशत 08प्रतिशत से ज़्यादा है, अंग्रेजी का 16 और मंदारिन का 14 प्रतिशत। फेंच, जर्मन सब हमसे पीछे हैं।

हिंदी भाषा की वर्चुअल दुनिया में स्थिति पर विचार करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि डिजिटल युग में हिन्दी एक ओर अभूतपूर्व विस्तार पा रही है तो दूसरी ओर अनेक चुनौतियों से भी जूझ रही है। सन् 2000 में जब हिन्दी का पहला वेबपोर्टल अस्तित्व में आया तभी से इंटरनेट पर हिन्दी ने अपनी छाप छोड़नी प्रारम्भ कर दी जो अब रफ्तार पकड़ चुकी है। नई पीढ़ी के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी ने भी इसकी उपयोगिता समझ ली है। मुक्तिबोध, त्रिलोचन जैसे हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि प्रकाशकों द्वारा उपेक्षित रहे। इंटरनेट ने हिन्दी को प्रकाशकों के चंगुल से मुक्त कराने का भी भरसक प्रयास किया है। इंटरनेट पर हिन्दी का सफर रोमन लिपि से प्रारम्भ होता है और फॉण्ट जैसी समस्याओं से जूझते हुए धीरे-धीरे यह देवनागरी लिपि तक पहुँच जाता है। यूनिकोड, मंगल जैसे यूनिवर्सल फॉण्टों ने देवनागरी लिपि को कम्प्यूटर पर नया जीवन प्रदान किया है। आज इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित लगभग सत्तर ई-पत्रिकाएँ देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं। संयुक्त अरब अमीरात में रहनेवाली प्रवासी भारतीय साहित्य प्रेमी पूर्णिमा बर्मन 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' नामक ई-पत्रिका की सम्पादक हैं और 1996 से 'प्रतिबिम्ब' नामक नाट्य संस्था चला रही हैं। 'अभिव्यक्ति' हिन्दी की पहली ई-पत्रिका है जिसके आज तीस हजार से भी अधिक पाठक हैं। 'अभिव्यक्ति' के बाद 'अनुभूति', 'रचनाकार', 'हिन्दी नेस्ट', 'कविताकोश', 'संवाद' आदि ई-पत्रिकाएँ इंटरनेट पर अपनी छटा बिखेर रही हैं। इनकी बढ़ती पैठ से घबराकर हिन्दी के अनेक प्रकाशकों-सम्पादकों ने अपनी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के ई-संस्करण जारी किए। फलस्वरूप आज 'हंस', 'कथादेश', 'नया ज्ञानोदय' जैसी न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। यही नहीं, आज जितने भी प्रतिष्ठितडिजिटल पत्रकारिता, ब्लॉग लेखन, ई-पत्रिकाएँ और वेब पोर्टल हिन्दी को वर्चुअल दुनिया में नया स्वरूप दे रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा मंचों पर भी हिन्दी की उपस्थिति बढ़ रही है, जिससे यह ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा और प्रबंधन जैसे विषयों में अभिव्यक्ति का माध्यम बनने लगी है। यूट्यूब पर हिन्दी कंटेंट क्रिएटर्स ने लाखों-करोड़ों दर्शकों तक पहुँच बनाकर यह प्रमाणित कर दिया है कि हिन्दी में अपार संभावनाएँ हैं। ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग ने भी हिन्दी को अपनाया है, क्योंकि भारत के उपभोक्ताओं का बड़ा तबका मातृभाषा में संवाद को प्राथमिकता देता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के युग में हिन्दी भाषा संसाधनों की कमी, मानकीकरण का अभाव और यूनिकोड की सीमाएँ भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इसके अतिरिक्त डिजिटल माध्यमों पर हिन्दी में गंभीर शोधपरक सामग्री अपेक्षाकृत कम उपलब्ध है, जिससे उच्च शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से इसका उपयोग सीमित दिखाई देता है। बावजूद इसके, सरकारी और निजी प्रयासों के साथ-साथ साहित्यकारों, पत्रकारों और आम उपयोगकर्ताओं की सक्रियता से हिन्दी का डिजिटल परिदृश्य लगातार मजबूत हो रहा है। हिन्दी विकिपीडिया, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन शब्दकोश और अनुवाद सेवाएँ हिन्दी के विस्तार में सहायक हो रही हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि वर्चुअल दुनिया में हिन्दी भाषा की स्थिति संक्रमणकालीन है—एक ओर इसमें असीम संभावनाएँ हैं जो इसे वैश्विक भाषा बना सकती हैं, वहीं दूसरी ओर इसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सतत प्रयासों की आवश्यकता है ताकि यह मात्र बोलचाल की नहीं बल्कि ज्ञान और नवाचार की भी प्रमुख भाषा बन सके।

सारांशत:हम कह सकते हैं कि हिन्दी का जनतंत्र विकसित हुआ है।मौजूदा दौर की हिन्दी आत्मविश्वास से लबरेज है। हिन्दी का यह जनतंत्र अंग्रेजी के आभिजात्य से डरा और घबराया हुआ नहीं है। हिन्दी संस्कृत की अनुकृति मात्र भी नहीं रही अब। वह संस्कृत, जनपदीय भाषाओं, अंग्रेजी और उर्दू से बतियाती हुई खुद की पहचान बनाने में सफल हुई है। वह धीरे-धीरे एक समर्थ भाषा के रूप स्थापित होकर अपने नए दौर के हौसले और भरोसे में बढ़ोत्तरी कर रही है। नयी शिक्षा नीति2020 ने भाषा के सिलसिले में दो बातों पर बल दिया है – पहली बात मतृभाषा में शिक्षा की वकालत और दूसरी बात बहुभाषिकता की व्याप्ति और ताकत को शिक्षायी नीति निर्धारण में में स्वीकार। सवाल यह है कि इससे हिन्दी पर क्या असर होगा। शिक्षा की दुनिया में भाषा का ज़िक्र दो सन्दर्भों में होता है – विषय के रूप में और माध्यम भाषा के रूप में। हिन्दी की दुनिया विषय के रूप में अपने विस्तार को बदलते दौर में बनाए रखे इसके लिए ज़रूरी है कि उसमें रोज़गार की सम्भावनाएं बरकरार रहे। जब मातृभाषा में शिक्षा की बात की जाती है तो एक बड़े भूभाग की मातृभाषा हिन्दी होने के कारण इस भाषा का माध्यम भाषा के रूप में स्वीकार, सरकारी नीतियों में एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ने के संकल्प को जाहिर करता है। यह बात ज़रूर समझ लेना चाहिए कि हिन्दी की ताकत को बढाने में भोजपुरी,मैथली, अंगिका, वज्जिका, अवधी, ब्रजभाषा, बुन्देली आदि जनपदीय भाषाओं की खासी भूमिका रही है। जाहिर बात यह है कि जनपदीय भाषाओं से अपनी जड़ों को मजबूत करने का अभ्यास निरंतर जारी रहे।