इस राष्ट्र राज्य से बेगाना है सीमांत समाज

ऐतिहासिक विकास-क्रम कई बार पदों क अर्थ में नृशंस बदलाव ला देता है। उदाहरण क लिए 'राष्ट्र' पद को लिया जा सकता है। भारत मे, आधुनिक संदर्भों में उन्नीसवी सदी के उत्तरा में 'राष्ट्र के अर्थ में जो सामूहिक चेतना, संघप् की तपन और औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति की कामना निहित थी, उसने न सिर्फ भारतीय संदर्भों में समरस और प्रगतिशील भविष्य का सपना देखा बल्कि उसने एशिया और अफ्रिका के अनेक देशों को औपनिवेशिक बेड़ियों से मुक्ति का सपना भी दिखाया। यहां यह लक्षित करना भी जरूरी है कि इस 'राष्ट्रवाद' का स्वरूप 'धर्मनिरपेक्ष' था और यह 'उदार बहुलवादी' (लिबरल प्लुरल) था। अपने अवधारणात्मक उद्देश्यों में यह एकदम स्पष्ट था, 'धर्म को राजनीति से अलग कर देना चाहिए और उसे निजी विश्वास और प्रतिबद्धता के क्षेत्र तक सीमित कर देना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति बन गई तो भारत जैसे बहुधर्मी समाज में भी अलग-अलग धर्मों में विश्वास रखने वाले व्यक्तियों को 'राष्ट्र' को वफादारी देने में कोई कठिनाई नहीं होगी। "

शोध आलेख

प्रो. निरंजन सहाय

2/28/2006