लोक और जीवन के साहित्यकार ख्यात साहित्यकार रामदरश मिश्र के देहावसान पर एक टिपण्णी)— डॉ. रामदरश मिश्र (प्र
मृत्योः स्मरणमेकं हि, जीवनस्य विमर्शः। न हि मृत्युः दुःखहेतुः, विस्मृतिः दुःखकारिणी॥” (मृत्यु का स्मरण ही जीवन का विवेक है,मृत्यु दुःख का कारण नहीं — विस्मृति उसका कारण है।) यह टिपण्णी मृत्यु की विस्मृति को नहीं, स्मृति के विस्तार को अपना ध्येय बना देता है। यह केवल मृत्यु पर विचार नहीं, बल्कि जीवन के अपराजेय सौंदर्य पर भी मौन श्रद्धांजलि है।
निरंजन सहाय
11/1/20251 min read


“मृत्योः स्मरणमेकं हि, जीवनस्य विमर्शः।
न हि मृत्युः दुःखहेतुः, विस्मृतिः दुःखकारिणी॥”
(मृत्यु का स्मरण ही जीवन का विवेक है;
मृत्यु दुःख का कारण नहीं — विस्मृति उसका कारण है।)
आज हिन्दी साहित्य का हृदय शोकाकुल है।
डॉ. रामदरश मिश्र का देहावसान केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि लोक और संवेदना के उस दीर्घ महाकाव्य का अंतिम पद है, जो बीसवीं शताब्दी से लेकर इस नई सदी तक मानव की पीड़ा, प्रेम और प्रतिरोध का गीत गाता रहा।
गोरखपुर जनपद के डुमरी गाँव में जन्मे रामदरश मिश्र उस माटी के कवि थे जहाँ खेतों की गंध और लोकगीतों की लय एक साथ बहती है।
उन्होंने बचपन में जो धूल, पगडंडियाँ और बैलों की घंटियाँ देखीं, वही उनकी कविता की बुनियाद बनी।
शहरों में रहकर भी उन्होंने अपने गाँव को कभी छोड़ा नहीं—बल्कि “गाँव को उन्होंने अपने भीतर बसाए रखा।”
दिल्ली विश्वविद्यालय में दीर्घकालीन अध्यापन के दौरान उन्होंने न केवल पीढ़ियों को शिक्षित किया, बल्कि साहित्य को जीवन की भाषा में समझने का नया संस्कार दिया।
रामदरश मिश्र का साहित्य लोक और आधुनिकता का अद्भुत संगम है।
उनकी कविताएँ — ‘आग भी हम ही लोग लगाते हैं’, ‘पक रही है धूप’, ‘बने रहते हैं घर’, ‘दिन अभी ढला नहीं’ — जीवन के श्रम और सौंदर्य को एक ही साँस में व्यक्त करती हैं।
उनके उपन्यास ‘जल टूटता हुआ’, ‘पानघट’, ‘बीच में’ में समाज की टूटन और जिजीविषा का सत्य उभरता है।
संस्मरण ‘जैसे उनके दिन फिरे’ और कथा-संग्रह ‘तीसरा बेटा’, ‘प्लेटफॉर्म पर एक रात’ — मनुष्य के छोटे-छोटे क्षणों को इतिहास बना देते हैं।
उनका लेखन यह प्रमाण है कि ग्राम्य अनुभव भी विश्व-संवेदना का रूप ले सकता है।
वे कवि नहीं, बल्कि लोक-जीवन के इतिहास-पुरुष थे—जिन्होंने कविता को खेत की गंध और कहानी को आत्मा की भाषा दी।
उनकी कविताएँ यह सिखाती हैं कि मनुष्य की असल पहचान उसकी मिट्टी में है।
वे कहते थे—
“मैं जीवन से दूर नहीं, जीवन के भीतर लिखता हूँ।”
यह वाक्य अब हिन्दी साहित्य की आत्मा का सूत्र बन गया है।
उनके भीतर का लोक केवल दृश्य नहीं, दर्शन था —
“यत्र लोकः तत्र कविः, यत्र कविः तत्र सत्यं।”
(जहाँ लोक है, वहीं कवि है; और जहाँ कवि है, वहीं सत्य है।)
वह देह त्याग कर भी लोक में शेष रह जाता है।)
डॉ. रामदरश मिश्र अब देह से दूर हैं, पर उनके शब्द हमारे समय की साँसों में हैं।
उनकी कविता, उनका लोक, उनका प्रेम—हमारे भीतर का मनुष्य बनकर जीवित रहेंगे।
—अश्रुपूरित नमन
