मैंने लाखों के बोल सहे (लोकसंस्कृति मूलक चेतना और रेणु की कहानियाँ)

"सारे हिन्दी लेखकों को..... गाँवों में भेजना चाहिए, एकदम ! गाँवों में किसानों के साथ काम करें-और किसी को 'उससे ज़्यादा कुछ' करना हो तो खान में ज़रा भेजें!... ये हिन्दी के लेखक, जो सब अपने को 'जनता' समझ बैठे हैं। जो सोचते हैं कि वे सब-कुछ जान गये हैं, लिखने को जान गये हैं, राष्ट्रभाषा उनकी हो गयी है.... और असल में इनकी ग़रीबी का, बौद्धिक ग़रीबी का हिसाब नहीं है। ये और कुछ जानते ही नहीं, धान का पेड़ होता है या पौधा-यही ये नहीं जानते। मगर ये समस्या उठायेंगे मज़दूरों की ! जिनसे इनका दूर का भी रिश्ता नहीं।" फणीश्वर नाथ रेणु (जर्मनी के विद्वान डॉ. लोठार लुट्से द्वारा रेणु के साक्षात्कार का एक अंश, रेणु रचनावली-भाग-4, पृ.सं.435)

प्रो. निरंजन सहाय

3/31/2008