पंडागिरी और पांडित्य के द्वन्द्व में 'आख़िरी कलाम'

यदि गद्य का गहरा संबंध वैचारिकता से है, तो विचारहीन समय में गद्य का प्रारूप फिर से कैसे सिरजा जाय ? यदि उपन्यास को महाकाव्यात्मक गरिमा का स्थानापन्न स्वीकार किया जाय तो उसमें व्याख्यायित घटनाओं को खंडित और पराजित दुःस्वप्नों से कैसे जोड़ा जाय ? दूधनाथ सिंह के बेहद चर्चित उपन्यास 'आख़िरी कलाम' को इन संदर्भों में देखना एक दिलचस्प अनुभव है।

शोध आलेख

प्रो. निरंजन सहाय

9/30/2004

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