राहें मंज़िल की बाक़ी हैं दुश्वारियाँ (भारतीय सदर्भ में शैक्षिक वर्चस्व की पड़ताल )
भारतीय संदर्भों में राजसत्ता, समाज व्यवस्था और शिक्षा संदर्भों के बेहद संश्लिष्ट अनुभव रहे हैं। औपनिवेशिक समय से लोकतान्त्रिक अनुभवों तक और अब बाजारवाद के इस मौजूदा दौर की यात्रा में इसे बखूबी देखा-समझा जा सकता है। इन ताकतों को निर्धारित करने में समाज की उन वर्चस्ववादी शक्तियों की अहम भूमिका रही जिन्होंने परंपरागत रूप से इन ढाँचों पर अपना नियंत्रण रखा। कभी परोक्ष रूप से तो कभी अपरोक्ष रूप से वर्णवाद, सामंतवाद या फिर पुरुष वर्चस्व की अनुगूँजों को शैक्षिक परिवेश में हम देख सकते हैं। आज़ादी के सूरज के उगने के बाद जब लोकतान्त्रिक दुनिया में जाने के मंसूबे तय हुए उस समय ऐसा लगा कि तेज़ परिवर्तन के दौर का आगाज़ हो चुका है। ऐसा नहीं कि बदलाव की बयार नहीं बही पर परिस्थतियों की अनेक जटिलताएँ बदस्तूर जारी रहीं। यह जानना जरूरी है कि कैसे शिक्षा संबंधी नीतियों के निर्धारण में वर्चस्ववादी तबके की केन्द्रीय भूमिका असर डालती है।
शोध आलेख
प्रो. निरंजन सहाय
6/30/2013


